दास्तान-ए-इश्क ( पार्ट -1)
शाम के पाँच बज चुके थे। सूर्य ने अपनी किरणों की पोटली बाँधनी शुरू कर दी थी और दिन भर की कमाई लेकर घर लौटने की जल्दी में था।
राघव की नज़र जैसे ही दीवार घड़ी से टकराई वह एकदम से चौंक सा गया। उसने उठ के फटाफट मुँह धोया, कपड़े बदले और आईने के सामने खड़ा होके बाल सवारने लगा।
आज उसके व्यवहार में अजब सी हड़बड़ाहट अजीब सी जल्दी थी। आज से पहले तो उसने इतनी जल्दबाजी किसी काम में दिखाई ही नहीं थी। लेकिन आज वो हर काम इतनी तेज़ी से कर रहा था कि मानो यदि एक क्षण की भी देरी हुई तो वह अपना सब कुछ खो देगा । उसकी नज़र फिर से घड़ी की तरफ गयी , अब तक साढ़े पाँच बज चुके थे । उसने फटाफट खूंटी से बाइक की चाबी उतारी , फेस मास्क पहना जेब में एक छोटी सी हैंड सैनीटाइजर की शीशी डाली और पलक झपकते ही दौड़ता हुआ सीढ़ियों से नीचे आ गया , बाइक स्टार्ट की और निकल गया ।
छः बज चुके हैं यह सूचना देने के लिए घण्टाघर का घण्टा टनटना रहा था । अंधेरा धीरे-धीरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले रहा था। हालाँकि अभी भी आदमजात के चेहरे पहचाने जा सकते थे, लेकिन फिर भी रोड लाईटे जल चुकीं थीं। सभी को कहीं न कहीं जाने की इतनी जल्दी थी कि एक दूसरे से आगे निकलने के लिए वजह बेवजह ही हॉर्न बजाए जा रहे थे । हॉर्न बजाने बालो को इससे कोई मतलब नहीं होता है कि उन्हें कोई सुन भी रहा है या नहीं । हॉर्न बजाना तो उनके लिए एक नैसर्गिक क्रिया है! जो उन्हें करनी ही करनी है । जैसे सांस लेना , भोजन करना और मंदिर के सामने से गुजरते हुए सर झुकाना आदि । लेकिन राघव अपनी धुन में इतना खोया था कि संसार में क्या घटित हो रहा है उसे कोई मतलब ही नहीं था । उसके लिए शहर "मिस्टर बीन" के शो की तरह मूक हो चुका था ।
लगभग 15 - 20 मिनट का रास्ता तय करने के बाद राघव ने शहर के बाहरी हिस्से से सटे एक रेस्त्रां के सामने अपनी बाइक रोकी , पार्किंग में पार्क की और अंदर चला गया । यह एक ऐसा स्थान था जो शहर में था भी और नहीं भी । यहां तक आते आते शहर की बस्ती लगभग खत्म सी हो जाती थी लेकिन शहर की चकाचौंध वैसी ही बनी रहती थी । यही कारण था की यह स्थान शहर में होते हुए भी शहर में था । इस रेस्त्रां की विशेषता यह थी, कि यह प्रेमी युगल के मिलन की सबसे बेहतरीन जगह थी । जब भी किसी चकवा - चकवी की आंखें अपने प्रिय के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठती थी तो उन्हें इसी स्थान पर आकर तृप्ति मिलती थी ।
हालाँकि रेस्त्रां में बहुत ज्यादा भीड़ नहीं थी फिर भी राघव की पुतलियां एक जगह ठहर नहीं पा रहीं थीं। उसकी आँखे बेसब्री से किसी को ढूंढने में व्यस्त थीं ।
"अब तक तो आ जाना चाहिए था।" राघव ने धीरे से बुदबुदाया । उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और रेस्त्रां की कॉर्नर टेबल पर जाकर किसी का नम्बर डायल करने लगा । वह जितनी बार भी फोन लगाता , हर बार एक ही आवाज उसका स्वागत करती , "आपके द्वारा डायल किया गया नम्बर अभी बंद है, कृपया कुछ समय पश्चात पुनः प्रयास करें।" राघव के दिमाक की नसें यह सोच कर फ़टी जा रहीं थीं कि कहीं वही तो नहीं होने बाला है जिसका उसे भय था । लेकिन अभी वह कुछ भी उल्टा पुल्टा सोचना नहीं चाहता था इसीलिए यह सोचकर कि शायद! नेटवर्क की खराबी की वजह से फोन नहीं लगा, शून्य में निहारने लगा । शून्य में नज़रे गड़ाए राघव बैठे बैठे अपने अतीत में खो गया ।.........
(शेष अगले हफ्ते)
__________©®_____ राज मोहन पाठक
(राघव किससे मिलने आया था यहां, वह किसे फोन कर रहा था, जानने के लिए पढ़िए अगले हफ्ते इसी क्रम में आगे की दास्तान)
Very nice ...I have no words for your creation ...really amazing....I'm waiting for next part..❤
ReplyDeletethanx a lot
Deletewaah bhaai
ReplyDeleteशुक्रिया बन्धु
Deleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteधन्यवाद
DeleteVery nice bhai
ReplyDeleteशुक्रिया
DeleteWow what a story i have no word to explain yourself because you are a best creator
ReplyDeleteThanks dear
Deleteभाई साहब आप की रचना दिल को छू गई बेहद खूबसूरत लिखा है। आपको पढ कर बहुत अच्छा लगा बहुत बहुत शुभकामनाएं
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