दास्तान-ए-इश्क (पार्ट-3)



(फ्लैशबैक में...)

प्रयागराज, जहाँ संगम होता है तीन नदियों का, सभ्यताओं का, संस्कारो का। ऐसा कहा जाता है कि रामचन्द्र जी ने भी वनगमन के समय अपनी प्रिय जानकी के साथ यहीं विश्राम किया था। हर 12 वर्ष बाद पूरे देश यहां तक कि विदेश तक से लोग आकर कुम्भ के मेले में मिलते हैं । संगम का तट, उड़ते चहचहाते पक्षी, नदी में डूबता सूरज और उसकी धीमी रोशनी में चमकती रेत किसी को भी अपने वश में करने के लिए काफी है। राघव यहीं बचपन से पला बढ़ा । प्रयागराज का प्रेम उसकी पोर-पोर में समाहित था । अब वह "इलाहाबाद राजकीय महाविद्यालय" से ग्रेजुएशन कर रहा था और दूसरे वर्ष में था।
        प्रिंसी एक सीधी-साधी भोली-भाली लड़की थी। वह बिल्कुल आम लड़कियों जैसी ही थी कोई स्वर्ग की अप्सराओं जैसी नहीं। क्योकि अप्सराएँ तो स्वर्ग में होती हैं और स्वर्ग तो कहीं दिखाई ही नहीं देता न! लेकिन यह तो पृथ्वीलोक है! यहाँ इंसान होते हैं न, लगभग एक जैसे ही, तो प्रिंसी भी इनके जैसी ही एक आम सी लड़की थी। हाँ वो बात अलग थी कि वो अपनी उम्र से ज्यादा सोचने लग जाती थी, एक दम बूढ़ी नानी की तरह । 
        प्रिंसी जौनपुर की रहने बाली थी। वह यहां अपनी बुआ के घर(प्रयागराज) पर रहकर अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने आई थी। अब वह अपनी मर्जी से आयी थी या.... जबरदस्ती भेजी गयी थी, ये उसका अपना मामला है हमको इससे क्या? चलिए आगे बढ़ते हैं और जानते हैं कि संगम के शहर में प्रिंसी और राघव का संगम कैसे हुआ।
        स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में शीना ने प्रिंसी को राघव से मिलवाया जरूर था, लेकिन वो कोई इतनी खास मुलाकात नहीं थी। एक साधारण सी घटना मात्र थी जिसे राघव भूल भी चुका था। आज अचानक एक अनजाने नम्बर से राघव के पास मैसेज आया। नंबर तो प्रिंसी का था लेकिन मैसेज शीना ने करवाया था। उसे किसी सब्जेक्ट के नोट्स चाहिए थे इसीलिए। बात फिर आयी गयी हो गयी, लेकिन प्रिंसी और राघव के नम्बर एक दूसरे के पास पहुंच चुके थे वो बात अलग थी कि इनकी ज्यादा बात चीत नहीं होती थी। लेकिन नियति तो कुछ और ही चाहती थी। आखिर बात न भी होती तो कब तक!
        एक दिन प्रिंसी का मैसेज आया कि राघव को कोई दिक्कत न हो तो "क्या वो उसे कॉल कर सकती है?" क्योंकि प्रिंसी इन दिनों अपने घर जौनपुर में थी और उसे कॉलेज के बारे में कुछ पूछना था। राघव को भला क्या आपत्ति होती, उसने भी हाँ कर दी। फिर क्या? शुरू हो गया बातों का सिलसिला । कॉलेज से लेकर प्रयागराज तक, स्कूल से लेकर कॉलेज तक, न जाने कितनी बातें उस दिन हुईं। ऐसा लग रहा था कि दुनिया बस खत्म ही होने बाली है, जितनी बातें हों आज ही कर ली जाएं। जब फोन कटा तब पता चला कि बात पूरे 3 घण्टे चली थी। लेकिन कैसे? अभी तो सब बातें पूरी भी नहीं हुई थीं, और इतनी जल्दी 3  घण्टे भी बीत गए। जब क्लास में लेक्चर चल रहा होता है तब तो 45 मिनट की क्लास भी वर्षो सी लगती है और आज 3 घण्टे इतनी जल्दी बीत गए आश्चर्यजनक था।
        अब तो यह रोज का क्रम बन चुका था और कर्म भी। घण्टों फोन पे बाते उसके बाद मैसेज पे बाते , बातें थीं कि आदमी के इतिहास की गाथा जो खत्म होने का नाम ही नही लेती थी। लेकिन कुछ भी कहो, आनन्द था उन बातों में । एक अलग ही दुनिया थी इस दुनिया के समानन्तर। जहाँ न छल था न घृणा थी न द्वेष था! बस बातें थीं खट्टी-मीठी चटपटी अपनेपन की बातें । और बातों ही बातों में वो हुआ जो शायद नहीं होना चाहिए था । या यूँ कह लीजिए कि उम्र के इस पड़ाव में जो हर किसी के साथ होता ही होता है। नहीं ! नहीं! प्रेम नहीं!..... आकर्षण, जी हाँ आकर्षण! क्योकि आकर्षण ही तो प्रेम की पहली सीढ़ी है। प्रेम के बिना आकर्षण सम्भव है.....किन्तु आकर्षण के अभाव में प्रेम असम्भव! प्रिंसी ने भी राघव को आकर्षित किया था ।और यह स्वाभाविक भी था। ऋणात्मक और धनात्मक तो सदैव से एक दूसरे को आकर्षित करते आये हैं यही तो प्रकृति का नियम भी है । तो इसमे कुछ गलत भी नहीं था।
 लेकिन राघव को प्रिंसी के रूप लावण्य ने आकर्षित नहीं किया  था। राघव को आकर्षित किया था प्रिंसी की बातों ने। इस उम्र में वो दादी नानी जैसी बड़ी बड़ी बातें करती। पता नहीं कहाँ कहाँ के किस्से सुनाती और राघव बस उसे चुप चाप सुनता रहता.....सुनता रहता......सुनता रहता......। अगर वह धोखे से उसकी बात काट भी देता तो वह गुस्से में कहती-- "चुपो अच्छा तुम!" लेकिन राघव को इस गुस्से में भी प्यार नज़र आता।
         जी हाँ अब राघव प्रिंसी से प्रेम करने लगा था। उसकी बातों से , उसके गुस्से से , बार बार उसकी रूठने की आदत से। प्रिंसी ने उसे बातों ही बातों में सब बता दिया था कि बचपन में ही उसकी माँ गुजर गयी थी और बिन माँ की बच्ची इस निठुर दुनिया में कैसे बड़ी हुई। राघव के ह्रदय में प्रेम का अथाह महासागर था, वह उसे पूरा प्रिंसी पर उड़ेल देना चाहता था । उसके हर दर्द को ,हर पीड़ा को उससे छीन के उसे अपने प्रेम की शीतल छाया देना चाहता था। लेकिन प्रिंसी अभी तक इन सब बातों से अनजान थी। राघव प्रिंसी से अभी तक अपने दिल की बात कह ही नहीं पाया था उसने हिम्मत तो कई बार की लेकिन फिर यह सोच कर पीछे हट गया कि प्रिंसी उसके बारे में पता नहीं क्या सोचेगी। आज राघव ने तय किया कि कुछ भी हो जाए वो प्रिंसी को अपने दिल की बात बता के ही रहेगा........
 शेष अगले हफ्ते....
 (आपको क्या लगता है राघव ने हिम्मत जुटा पाई कमेंट करके जरूर बताइए। आगे की दास्तान पढ़ने के लिए बने रहिए हमारे साथ और इंतज़ार करिए अगले हफ़्ते का।
 और हाँ इसे शेयर करना न भूलिएगा।)

                _______©®_____ "राज मोहन पाठक"

        
        

Comments

  1. Replies
    1. उद्देश्य सफल हुआ, आपका आनन्द आना ही मेरे लिखने की सार्थकता है।♥️🙏

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  2. बहुत ख़ूब, राघव हिम्मत जुटाकर कह दे तभी सही भी है अन्यथा जीवनभर न कह पाने की ग्लानि रहेगी।

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    1. बहुत बहुत विकास भइया जो अपने पढा ।🙏♥️♥️♥️

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  3. सुंदर...✍️🙏
    वैसे मै भी प्रयागराज में ही हूं ।

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    1. अरे वाह........
      ढूंढो ढूंढो शायद राघव मिल जाये!
      वो भी वहीं रहता है♥️♥️♥️
      लास्ट पार्ट पढ़ना न भूलना!👍💐💐

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