दास्तान-ए-इश्क (पार्ट-4) The End
राघव तय कर चुका था कि अब चाहे कुछ भी हो जाए वह प्रिंसी को अपने दिल की बात बता के ही रहेगा। लेकिन वो कहते हैं न "समय से पहले और मुकद्दर से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता।" शायद सृष्टि नियंता ने कुछ और ही योजना बना रखी थी। आज सुबह से राघव के सर में बेतहाशा दर्द हो रहा था और चक्कर भी आ रहे थे। उसने दर्द की सामान्य दवाई ली लेकिन वो बेअसर रही। अंततोगत्वा उसे शाम को डॉक्टर के पास जाना ही पड़ा। डॉक्टर के पास से लौटते लौटते रात के 12 बज चुके थे। जाहिर सी बात है कि घर बाले चिंतित थे।सो घर में घुसते ही उस पर प्रश्नों की बौछार शुरू हो गयी। सबसे पहले उसकी मम्मी ने पूछा - "इतनी देर क्यों लगा दी? कहीं और चले गए थे क्या?" राघव --- "नहीं...(थोड़ा रुक कर)... हां! वो संगम तक चला गया था।" मम्मी -- "इतनी रात को संगम! वहाँ क्या करने गए थे?" राघव - "कुछ नहीं बस ऐसे ही चला गया था।" तब तक उसके पिता जी भी छत से नीचे उतर आये थे। बरामदे की लाइट ऑन करते हुए उससे बोले- "क्या बात है ? सब ठीक तो है न! और डॉक्टर ने क्या बताया?" राघव - ...